(29)
बोले भावस्थ चन्द्रमुख निन्दित रामचन्द्र,
प्राणों में पावन कम्पन भर स्वर मेघमन्द्र,
“देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधर
शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर,
पार्वती कल्पना हैं इसकी मकरन्द विन्दु,
गरजता चरण प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु।
व्याख्या : चंद्रमा की कांति को लज्जित करने वाले मुख के स्वामी राम भाव-मग्न होकर बोले | उनके शरीर में सात्विक भाव से पवित्र कंपन होने लगा और स्वर मेघ गर्जन की तरह गंभीर हो गया | राम ने कहा — “बंधुओ! सामने जो सैकड़ो हरित-कुंजो, वृक्षों और घास आदि से जो हरा-भरा पर्वत सुशोभित है, वह शंकर-प्रिया पार्वती की मौलिक कल्पना है जिससे परागकण झर रहे हैं | इस पर्वत प्रदेश के पाद-तल में गरजता हुआ सागर वस्तुतः सागर नहीं है बल्कि महाशक्ति का चरण-सेवी सिंह गरज रहा है |
(30)
दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,
अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर,
लख महाभाव मंगल पदतल धँस रहा गर्व,
मानव के मन का असुर मन्द हो रहा खर्व।”
व्याख्या : दसों दिशाएँ ही माँ महाशक्ति के दस हाथ हैं और देखो ऊपर आकाश में वस्त्रहीन शिव पूजित हैं, जिनके मंगलमय महा भाव के आगे समस्त दर्प चूर हुआ जा रहा है। इनके दर्शन से मानव-मन की आसुरी भावनाओं का दानव धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है।
(31)
फिर मधुर दृष्टि से प्रिय कपि को खींचते हुए
बोले प्रियतर स्वर सें अन्तर सींचते हुए,
“चाहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इन्दीवर,
कम से कम, अधिक और हों, अधिक और सुन्दर,
जाओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर
तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।”
अवगत हो जाम्बवान से पथ, दूरत्व, स्थान,
प्रभुपद रज सिर धर चले हर्ष भर हनुमान।
राघव ने विदा किया सबको जानकर समय,
सब चले सदय राम की सोचते हुए विजय।
व्याख्या : इसके पश्चात राम ने अपनी प्रेम भरी दृष्टि से अपनी और आकर्षित करते हुए और अपेक्षाकृत अधिक मधुर स्वर से उनके हृदय को संचित करते हुए कहा — ” आज उषा बेला में ही तुम शीघ्र देवीदह ( नीलकमलों युक्त एक तालाब ) जाओ। हे हनुमान ! हमको एक सौ आठ नीलकमलों की आवश्यकता है। कम से कम एक सौ आठ तो हो ही जाने चाहिए और यदि कुछ अधिक मिल सकें तो और भी अच्छा है। तुम देवीदह जाकर नीलकमल तोड़कर ले आओ और फिर निश्चिन्त होकर युद्ध करो। हनुमान जाम्बवान से उस स्थान की दूरी और पथ-निर्देश लेकर राम की चरण धूल सिर पर रखकर हर्षित होकर चल दिये। विश्राम-समय जानकर राम ने सभी सभासदों को विदा किया। सब कृपालु राम की विजय-कामना करते हुए चले गये।
(32)
निशि हुई विगतः नभ के ललाट पर प्रथम किरण
फूटी रघुनन्दन के दृग महिमा ज्योति हिरण।हैं नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कन्ध
वह नहीं सोहता निविड़-जटा-दृढ़-मुकुट-बन्ध,
सुन पड़ता सिंहनाद,-रण कोलाहल अपार,
उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार,
पूजोपरान्त जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,
मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम,
बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण
गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन।
व्याख्या : रात्रि बीत गई। आकाश के मस्तक पर सूर्य की प्रथम किरण हिरनी के समान दिखाई दी अर्थात् उषा बेला हो गई। यह किरण ऐसी प्रतीत हुई, मानो राम के नेत्रों से महिमा-महत्व की स्वर्णिम ज्योति बिखर रही हो। आज राम के हाथ में धनुष नहीं है और कन्धे पर तरकस भी नहीं है। वह कसकर बाँधा हुआ घना जटा-मुकुट भी आज सुशोभित नहीं है अर्थात राम ने उपासना रत होने के कारण आज अपना जटा-मुकुट भी नहीं बाँधा है। राम को शत्रु-पक्ष के सैनिकों का सिंहनाद एवं अपार कोलाहल सब कुछ सुनाई दे रहा है, किन्तु मन युद्ध के लिए उत्साहित नहीं हो पा रहा है। उनका मन शान्त है, वे बुद्धिमान हैं और ध्यान-मग्न हैं। वे उपासना के पश्चात् दशभुजी दुर्गा का नाम जप करते हैं, वे उनके असंख्य नामों का अपने मन में मनन एवं चिन्तन करते हैं। वह दिन दुर्गा उपासना में व्यतीत हो गया और मन माँ दुर्गा के चरणों में एकाग्र हो गया। दिनों-दिन माँ दुर्गा की पूजा उपासना में वृद्धि ही होती चली गई।
(33)
क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस,
चक्र से चक्र मन बढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस,
कर-जप पूरा कर एक चढाते इन्दीवर,
निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर।
चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित-मन,
प्रतिजप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण,
संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर,
जप के स्वर लगा काँपने थर-थर-थर अम्बर।
दो दिन निःस्पन्द एक आसन पर रहे राम,
अर्पित करते इन्दीवर जपते हुए नाम।
व्याख्या : इस प्रकार क्रम से उपासना करते-करते राम के पांच दिन बीत गए | उनका मन आलस्य-रहित होकर एक चक्र से दूसरे चक्र में ऊपर चढ़ता गया | महाशक्ति का जप तथा पूजा करने के बाद वे एक हाथ से एक नीलकमल महाशक्ति पर चढ़ा देते थे। इस प्रकार वे अपना मंत्र जाप पूरा कर रहे थे। छठे दिन आज्ञाचक्र में प्रवेश करके उनका मन महाशक्ति में समा गया। उन्होंने अपना मन त्रिकुटी में केन्द्रित कर लिया और पंखड़ियों के समान दोनों नेत्र देवी के चरणों में केन्द्रित कर दिये। प्रत्येक जाप-मंत्र से विशेष आकर्षण उत्पन्न होने लगा। मंत्र जाप के स्वर से आकाश थर-थर काँपने लगा। राम दो दिन तक एक ही आसन पर स्थिर बैठे रहे। वे महाशक्ति के नाम जपते हुए एक-एक कर नीलकमल अर्पित कर देते थे।
(34)
आठवाँ दिवस मन ध्यान-युक्त चढ़ता ऊपर
कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर,
हो गया विजित ब्रह्माण्ड पूर्ण, देवता स्तब्ध,
हो गये दग्ध जीवन के तप के समारब्ध।
रह गया एक इन्दीवर, मन देखता पार
प्रायः करने हुआ दुर्ग जो सहस्रार,
द्विप्रहर, रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर
हँस उठा ले गई पूजा का प्रिय इन्दीवर।
व्याख्या : आठवां दिन ध्यानस्थ होकर ऊपर बढ़ता ही चला गया और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश के स्तर को भी पार कर गया | इस स्थिति में उन्होंने समस्त ब्रह्मांड पर अधिकार प्राप्त कर लिया । इसे देखकर आश्चर्य से देवता अवाक् रह गये। इस तप से जीवन के समस्त कर्म नष्ट हो गये और राम को देह सहित मुक्तावस्था प्राप्त हो गई। साधक की यह परम स्थिति है। चढ़ाते-चढ़ाते केवल एक नीलकमल ही शेष रह गया। अन्त में मन अन्तिम सहस्रार दुर्ग को भी पार करने को हुआ, जहाँ सहस्रदल कमल खिलता है। रात्रि के दो प्रहर ही व्यतीत हुए थे कि माँ दुर्गा छिपकर आई और हँसकर पूजा के अंतिम नीलकमल को उठाकर ले गई |
(35)
यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल।
कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल,
ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल।
देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय,
आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय,
“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध |
व्याख्या : राम का यह अंतिम जप था | राम का ध्यान देवी दुर्गा के दोनों चरणों पर केंद्रित था | मंत्र जाप के बाद जैसे ही राम ने नीलकमल लेने के लिए हाथ बढ़ाया उनके कुछ भी हाथ नहीं आया | इस कारण उनका अब तक स्थिर रहा मन विचलित हो गया | उनका ध्यान भंग हो गया और उन्होंने अपनी विमल पलकें खोल कर देखा कि वह स्थान जहां नीलकमल रखा था, खाली पड़ा था | यह तप का अंतिम समय था और इस समय आसन छोड़ना भारी असफलता थी | इस घटना से राम के दोनों नेत्र अश्रुपूरित हो गए | वह बोले ऐसा जीवन जिसे सदैव विरोधों का ही सामना करना पड़ा, धिक्कार है ऐसा साधन जिनके लिए खोज में लग ही रहे, धिक्कार है |
(36)
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,
बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”
व्याख्या : श्री राम व्यथित होकर कहते हैं — “जानकी! प्रिया मुझे अपार कष्ट है कि मैं तुम्हारी मुक्ति में असफल हो गया | जिस मन से राम हताश हो रहे थे उस मन के अतिरिक्त राम का एक और अवचेतन मन था जो अभी तक हार नहीं जानता था, जिसने कभी दीनता को नहीं जाना, विनय को नहीं जाना। वही मन सारे मोह एवं माया के आवरणों को पार करके विजयी हुआ। वह चेतना शून्य मन बिजली की तरह झपटकर बुद्धि के दुर्ग पर पहुँच गया। राम में स्मृति का जागरण हुआ और वे एक प्रसन्न भाव को पाकर सावधान हो गये। राम बादल के मन्द स्वर की भाँति सहसा कह उठे कि हाँ यह एक उपाय अन्तिम नीलकमल प्राप्त करने का है | मेरी माता मुझे सदैव राजीव नयन कहा करती थी ठीक है तो मेरे यह दोनों नेत्र नीलकमल ही हैं जो अब शेष रह गए हैं | हे माता! मैं अभी तुम्हें एक नेत्र समर्पित करके यह अंतिम मंत्र जाप भी पूरा करता हूँ |
(37)
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
व्याख्या : राम ने महाशक्ति को सम्बोधित करने के बाद अपना तरकस देखा तो उसमें ब्रह्मशर ( ब्रह्म-शक्ति से युक्त बाण ) दिखाई दे गया। उस बड़े फल वाले चमचमाते हुए बाण को राम ने हाथ में ले लिया। बायें हाथ में अस्त्र लेकर दायें हाथ में दाहिना नेत्र लेकर जब वे फूल चढ़ाने को तैयार हो गये और जिस समय आँख निकालने का पूरा-पूरा निश्चय हो गया तो समस्त ब्रह्माण्ड प्रकम्पित हो उठा। उसी समय देवी दुर्गा शीघ्र ही प्रकट हो गईं। उन्होंने कहा- “धैर्य साधक राम ! धर्म को ही धन मानने वाले राम ! मैं तुम्हारा साधुवाद करती हूँ, तुम धन्य हो।” यह कहकर भगवती देवी ने राम का हाथ थाम लिया।
(38)
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।“होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।
व्याख्या : राम ने देखा सामने दुर्गा खड़ी हैं, उनका बायाँ पैर राक्षस के कन्धे पर है। दायाँ पैर सिंह पर है, वे ज्योति स्वरूपा हैं, उनके दसों हाथों में अनेक अस्त्र सुसज्जित हैं तथा मुख पर मन्द मुस्कान है, जिसे देखकर समस्त विश्व की शोभा भी लज्जित है। उनके दक्षिण पार्श्व में लक्ष्मी हैं, सरस्वती वाम पार्श्व में हैं, सीधी ओर गणेश हैं, युद्ध-प्रिय स्वामीकार्ति उनके बार्थी ओर हैं और उनके मस्तक पर शिव हैं, श्रद्धालु राम मन्द-मन्द स्वर में वन्दना करके माँ भगवती के चरण कमलों में प्रणत हुए। देवी दुर्गा यह कहकर कि अभिनव पुरुषोत्तम राम युद्ध में तुम्हारी निश्चित रूप से विजय होगी महाशक्ति के रूप में राम के शरीर में लीन हो गईं।
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